हमें धर्म को अपनाना ही नहीं है, अपितु हमें धर्म में जीना है। धर्म का अर्थ है सरल होना। यदि आप अपने आप में सरल हो तो आप धर्म में जीवन व्यतीत कर रहे हो। सरलता तो धार्मिकता की पहली प्राथमिकता है। मगर दु:ख की बात है हमने प्राथमिकता को प्राथमिकता नहीं दी, इसलिए हम लोग धर्म करते हुए भी तनाव ग्रस्त रहते हैं। सच्चे धर्म एवं जीवन जीने का प्रयास ही नहीं किया, इसलिए आज धर्म से विश्वास उठता जा रहा है।
यह प्रवचन स्कीम नंबर पांच स्थित गांधी नगर जैन स्थानक में दस लक्षण पर्व के दौरान राजेंद्र मुनि ने कहे। उन्होंने कहा कि धर्म स्थान में कुछ है और घर बाजार में कुछ और है। ये भी मुख्य कारण है कि हम धर्म साधना में सफल नहीं होते। हमारी भावनाओं में पूर्ण शुद्धता का अभाव होता है। जो चीज शुद्ध ही नहीं होती, तो हमें ताकत कैसे दे सकती है। भावना एवं व्यवहार हमारी साधना के प्रमुख अंग होने चाहिए, तभी हमें सफलता मिलेगी। जब राम को वनवास हो गया और पम्पा सरोवर के करीब पहुंचे तो राम ने देखा एक बगुला एक पांव पर खड़ा है और धीमी-धीमी आंखें मूंद रखी है और राम लक्ष्मण को कहने लगे देखो बगुला कितने तन्मय से खड़ा है।
बगुले ने भी श्री राम से कहा भगवान इस सरोवर में बहुत छोटे-छोटे जीव रहते हैं। अगर मैं तेज चलूंगा तो उन छोटे-छोटे जीवों की विराधना होगी। इसलिए मैं धीरे-धीरे चलता हूं। श्री राम ने जब बगुले की बात सुनी तो मन प्रसन्न हो गया और लक्ष्मण के आगे बगुले की प्रशंसा करने लगे। इतने में एक मछली उछली और कहने लगी। आप इस धूर्त की प्रशंसा कर रहे हो। इसने इस ध्यान के माध्यम से हमारे खानदान को खत्म कर दिया। इस बगुले का ध्यान सिर्फ दिखावा है। यह सरल नहीं है। बिना सरलता के धर्म नहीं होता। मुनि ने कहा कि हमारा धर्म बगुले की तरह नहीं होना चाहिए। हमारा धर्म कर्म तो आत्मस्वरूप में होना चाहिए, तभी हमारे पर्व हमें प्रसन्नता देंगे। इस अवसर पर प्रधान पीसी जैन, हरीश जैन, मुकेश जैन, प्रकाश जैन, डीआर जैन, अमित नंदी, श्रावक रामचंद्र जैन, मोतीराम जैन, रामूमल जैन, रामकलां जैन मौजूद रहे।
जिसके पास दुआओं की दौलत वो सबसे अमीर : अशोक शर्मा
महाराजा अग्रसेन मंदिर के पुजारी अशोक शर्मा ने कहा कि एक बार अपने क्रोध, अहंकार को ऑनलाइन बेच कर देखो कोई चवन्नी भी नहीं देगा। तब आपको पता चलेगा कि आपने कितनी फालतू चीज उठा रखी है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रभु श्रीराम ने अपनी जिंदगी में दु:खों का हंसकर मुकाबला किया। कांटों पर चलने वाला व्यक्ति अपनी मंजिल पर जल्दी पहुंच जाता है, क्योंकि कांटे कदमों की रफ्तार को बढ़ा देते हैं। उन्होंने कहा कि अपने दिन की शुरुआत प्रसन्नता और प्रमाण से करिए। जो व्यक्ति सुबह उठते ही एक मिनट भी मुस्कुराता है उसे पूरा दिन का पावर टॉनिक मिल जाता है और जो व्यक्ति मां-बाप, गुरु और प्रभु के चरणों में घुटने टिकाता है उसे जिंदगी में किसी के सामने घुटने नहीं टेकने पड़ते।
दुआओं की दौलत है, सही मायनों में वही अमीर है। इस दौलत की बदौलत ही व्यक्ति दौलतमंद होता है। जिस प्रकार पके हुए फल की तीन पहचान होती है। एक तो वह नरम हो जाता है, दूसरा वह मीठा हो जाता है, तीसरा उसका रंग बदल जाता है। इसी तरह से परिपक्व व्यक्ति की भी तीन पहचान होती है। पहला उसमें नम्रता, दूसरा उसकी वाणी में मिठास होती है, तीसरा उसके चेहरे पर आत्मविश्वास का रंग होता है। शर्मा ने कहा कि क्रोध अग्नि की तरह होता है। क्रोधी व्यक्ति पहले स्वयं को जलाता है फिर औरों को जलाता है। जिस दिन तुम्हे अपने हाथ, पैर और दिल पर भरोसा हो जाएगा उसी दिन तुम्हारी अंतरात्मा कहेगी कि बाधाओं को कुचलकर तुम अकेले चलो। अंत में जीत तुम्हारी ही होगी। कभी भी खतरों से मत घबराओ। परेशानी उन्हीं के रास्ते में आती है जो कुछ करने के लिए तैयार रहते हैं। दुनिया का सबसे मुश्किल काम है अपने काम से काम रखना।
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